जयपुर न्यूज डेस्क: राजस्थान की राजधानी जयपुर के बाहरी क्षेत्र स्थित मथुरादासपुरा डंपिंग यार्ड को लेकर एक चिंताजनक अध्ययन सामने आया है। केंद्रीय विश्वविद्यालय राजस्थान, अजमेर के पर्यावरण विज्ञान विभाग द्वारा किए गए शोध में दावा किया गया है कि प्लास्टिक कचरे से निकलने वाले रसायन आसपास की कृषि भूमि और जल स्रोतों को प्रदूषित कर रहे हैं। अध्ययन के अनुसार, प्लास्टिक में इस्तेमाल होने वाला रासायनिक पदार्थ बिस्फेनॉल-ए (BPA) मिट्टी और पानी में खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है, जिससे पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
एक वर्ष तक चले इस अध्ययन में डंपिंग यार्ड के दो किलोमीटर के दायरे में विभिन्न स्थानों से मिट्टी और पानी के नमूने एकत्र किए गए। जांच में मिट्टी में BPA की मात्रा 770.8 mg/L और पानी में 798.9 mg/L तक पाई गई। शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत में पानी और कृषि भूमि की नियमित जांच में BPA की जांच शामिल नहीं है, जबकि यूरोपीय संघ में इसके लिए कड़े मानक निर्धारित हैं। अध्ययन के अनुसार, डंपिंग यार्ड में जमा प्लास्टिक कचरा धीरे-धीरे टूटकर जहरीले रसायनों को मिट्टी और भूजल में छोड़ रहा है।
शोध में यह भी पाया गया कि BPA का असर कृषि फसलों पर पड़ रहा है। चने के पौधों पर किए गए परीक्षण में बीज अंकुरण, क्लोरोफिल, प्रोटीन और एंजाइम स्तर में कमी दर्ज की गई। अधिक मात्रा में BPA के संपर्क में आने पर पौधों की वृद्धि 70 से 80 प्रतिशत तक प्रभावित हुई। शोधकर्ताओं का मानना है कि लंबे समय तक इस तरह का प्रदूषण आसपास की कृषि भूमि की उर्वरता को कम कर सकता है और खाद्य सुरक्षा पर भी असर डाल सकता है।
अध्ययन में प्लास्टिक बोतलों और पैकेजिंग सामग्री से बनने वाले माइक्रोप्लास्टिक के प्रभावों का भी विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि माइक्रोप्लास्टिक की बढ़ती मात्रा पौधों की वृद्धि, प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया और कोशिकीय संरचना को नुकसान पहुंचाती है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि डंपिंग यार्ड के आसपास रहने वाले लोग और किसान इस खतरे से अनजान हैं, जबकि वे इसी क्षेत्र के पानी और भूमि पर निर्भर हैं। शोधकर्ताओं ने पर्यावरणीय निगरानी बढ़ाने और प्लास्टिक कचरे के प्रभावी प्रबंधन की आवश्यकता पर जोर दिया है।