सलमान खान की सिकंदर बहुत ही फीकी फिल्म है!!
फिल्म ईद पर रिलीज़ हुई हैं, लेकिन इसको कोई भी ईदी नहीं देने वाला!
डायरेक्टर - ए आर मुरुगादॉस
कास्ट - सलमान खान, रश्मिका मंदाना, सत्यराज, जतिन सरना, काजल अग्रवाल, अंजिनी धवन, शरमन जोशी, प्रतीक बब्बर, संजय कपूर और नवाब शाह आदि
एक समय था जब सलमान खान की फिल्म कैसी भी हो, कम से कम उसका पहला शो तो हाउसफुल होता ही था। ‘जय हो’, ‘रेस 3’, ‘दबंग 3’, ‘टाइगर 3’ जैसी तमाम फिल्में हैं जो सिर्फ सलमान खान के होने भर से भीड़ खींच लाती रही हैं। फिल्म ‘सिकंदर’ इसी चक्कर में इतवार को रिलीज हुईहै। एक बार फिर से सलमान खान एक रियासत के राजा के रूप में नजर आये। संजय राजकोट नाम है उनका, लोग उन्हें राजा साब बुलाते हैं। देश मेंमौजूद कुल सोने के 25 फीसदी के मालिक हैं। उम्र से कहीं कम एक युवती को बचाने के लिए उससे शादी करते हैं!
फिल्म ‘सिकंदर’ देखते समय न जाने क्यूं बार बार लगता रहता है कि पूरी फिल्म में सलमान खान हैं हीं नहीं। चेहरा दिखाने की बारी होती है तो माननापड़ता है कि वह सलमान खान ही हैं, लेकिन तमाम लॉन्ग शॉट्स, एक्शन शॉट्स और बैक टू कैमरा शॉट्स में यूं लगता है जैसे उनकी जगह कोई औरही शूटिंग कर रहा है। हो सकता है ये देखने का भ्रम हो लेकिन इस चक्कर में दर्शकों की सलमान के किरदार के साथ ‘ट्यूनिंग’ नहीं बन पाती है, कुछकुछ वैसे ही जैसे कि सलमान खान और रश्मिका मंदाना की लव स्टोरी से दर्शकों की एक परसेंट भी ट्यूनिंग नहीं बनती। दोनों में प्यार है, ये हमें शुरू मेंबता दिया जाता है। राजा साब के पास समय नहीं है अपनी रानी के लिए। उसे एक पल तक मांगना पड़ता है और उसी एक पल में वो गाना गा देतीहै, ‘कल आपके नसीब में ये रात हो न हो...’। अब गाना गा दिया है तो उसे मरना ही है, मरते मरते उसका दिल, फेफड़ा और आंखें तीन अलग अलगलोगों को मिल जाती हैं। ‘जय हो’ याद है न, एक अच्छा आदमी, तीन अच्छे आदमी बनाए तो ये चेन कैसे देश को बदल सकती है, टाइप्स! वह फिल्मए आर मुरुगादॉस की फिल्म ‘स्टालिन’ की रीमेक के तौर पर बनी थी।
फिल्म ‘सिकंदर’ में राजा साब को एक अच्छा आदमी दिखान के लिए प्रतीक बब्बर को लुच्चागिरी करते दिखाया जाता है। जिस नेता के बेटे के रोल मेंवह हैं, उसका किरदार सत्यराज ने किया है। न प्रतीक में विलेन वाला दम है और न सत्यराज में एक दबंग नेता की शख्सियत। दोनों मिलकर भी फिल्मका विलेन डिपार्टमेंट नहीं संभाल पाते हैं। पता नहीं क्या फूंककर ऐसी कहानियां लिखी जाती हैं, लेकिन जो भी ये फूंक रहे हैं, वह असली नहीं है। कहींका ईंट, कहीं का रोड़ा जैसी कहानियों में हुसैन दलाल और अब्बास दलाल ने क्या ही कुछ किया होगा, ये फिल्म की कास्टिंग देखते ही समझ आजाता है। हिंदी सिनेमा में हिंदी को लेकर लोग कितने सजग हैं, ये समझना हो तो फिल्म की कास्टिंग पर गौर कर लीजिए। जहां ज दिखा वहां नुक्तालगा देने वाले लोग जिस टीम में होंगे, उसका क्या ही हो सकता है कहने को रजत अरोड़ा भी है। लेकिन, बस कहने को! कहानी बेतुकी, पटकथाबिखरी हुई और संवाद, अमिताभ बच्चन की फिल्मों से मारे हुए। क्या ही कुछ हो सकता है ऐसे ‘सिकंदर’ का। गुजराती बोलने वाला एक राजा दिल्लीमें सीधे किसी से गुजराती में बात करता है और काम हो जाता है...! मेरा तो बड़ा मन किया नारा लगाने का, अबकी बार, राजकोट सरकार!
सलमान खान से एक्टिंग अब होती नहीं है, होती पहले भी कम ही थी, लेकिन पहले वह इसके लिए कोशिश तो करते ही थे। अब वह अपने प्रशंसकोंपर एहसान करते से दिखते हैं। उनको निर्देशित करने वाले निर्देशकों की मानें तो फिल्मों की शूटिंग भी वह ऐसे ही एहसान दिखा दिखा कर करते हैं।
अब तो ये पक्का यकीन हो चला है कि निर्देशक ए आर मुरुगादॉस की धुप्पल ही लगी थी आमिर खान की फिल्म ‘गजनी’ में। उसके बाद उन्होंने‘हॉलीडे’ बनाई, ‘अकीरा’ बनाई और अब ये ‘सिकंदर’। रिंग मास्टर हल्का पड़ जाए तो सर्कस के अदने से कलाकार भी खुद को तीसमार खां समझनेलगते हैं। फिल्म ‘सिकंदर’ में इसे होते हुए साक्षात देख सकते हैं। मुरुगादॉस ने दर्जनों कलाकार जुटाए हैं, लेकिन जमाकर अदाकारी एक से भी नहींकरा सके हैं। हर कलाकार ओवरएक्टिंग की दुकान बना हुआ है।
रश्मिका मंदाना के भाव देखकर यूं लगता है कि जैसे कह रही हों, मुझे एक्टिंग करने की जरूरत ही नहीं। मेरा तो बस नाम ही काफी है, फिल्म हिट करादेने के लिए।
गीत-संगीत फिल्म का माशा अल्ला है। नए गीतकार और संगीतकारों को साजिद नाडियाडवाला जैसे निर्माता ट्राई नहीं करते। इसका फायदा उठाकरम्यूजिक उस्ताद प्रीतम और समीर अनजान ने जो म्यूजिक फिल्म ‘सिकंदर’ का बनाया है, वह अगली ईद तक भी कोई याद रख पाया तो सुभानअल्लाह! बाकी, फिल्म ईद पर रिलीज़ हुई हैं, लेकिन इसको कोई भी ईदी नहीं देने वाला!